वसीयत
जब मैं न रहूंगा, मेरे बिस्तर पे गिटार पड़ी होगी। मेरी एनके शायद खो जाएगी फिर, पर तेरी उन्हे ढूंढने की कोशिश बेवजा होगी। अलमारी में मेरे कुर्ते पड़े होंगे, उनमें मेरी खुशबू पड़ी होगी। तू होगी सब होंगे फिर भी, तुझे मेरी थोड़ी कमी होगी। मेरे कमरे में कही मेरी दैनिकी रखी होगी, हो सके तो उसे छपवा देना। अखरी पन्ने में तेरा ज़िक्र है, उसे तू फाड़ लेना। मैं कल अपनी वसीयत लिखने बैठा था, मेरी यादों को तेरे नाम लिखने बैठा था। तेरे सोहबत को मेरा इनाम लिखने बैठा था, हमारे बीच की हर कलाम लिखने बैठा था।