कुछ अटपटी सी बातें

मेरी उंगलियां कैद बालों में तेरे,
चल अब जा के लट सुलझा है।
दिल तो तेरा गैर सा है,
फिर ये बेदिली क्यों मुझसा है?

कहती है तू गैर है,
पर आईने में तू दिखती है।
फ़र्श-ए- नाउम्मीद पे
शामियाने सी तू बिछती है।

गौर से तुझे देखा आज,
पर क्या देखा ये याद नहीं।
जिस्म से रूह बिछड़ती है,
रूह से रूहदार नहीं।

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